Neelam Mahendra

जीएसटी अधूरा ज्ञान या फिर दुष्प्रचार

30 जून 2017  भारतीय इतिहास में 8 नवंबर के बाद एक और ऐतिहासिक तारीख़
यहाँ 8 नवंबर का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि नोटबंदी काले धन पर प्रहार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था  ( वह कदम कितना सफल हुआ यह एक अलग विषय है)
जीएसटी को उसी लक्ष्य को हासिल करने हेतु अगला कदम समझा जा सकता है।

क्योंकि नोटबंदी के बाद सरकार के पास सबसे बड़ी चुनौती काले धन को दोबारा नहीं पनपने देने की है।
इस बात को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि काला धन बनता कैसे है।
तो काला धन दो तरह का होता है एक वो जो भ्रष्टाचार के द्वारा सरकारी अधिकारियों द्वारा रिश्वत के रूप में लिया जाता है और दूसरा वो जो सरकार को कर न देकर बचाया जाता है।

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रंग बदलते भारत के बदरंग किसान

आज का भारत एक खास नजरिये से एक सफल भारत है। अब तो किसी सभ्य नागरिक को पुण्य हेतु कर्मकांड पूरा करने के लिये पांच भिखारी को खाना खिलाना हो, तो भिखारी ढूंढना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसा कब हुआ, कैसे हुआ और किसने किया, यह कहना कठिन है। मगर आज गांव से शहर तक भारतीय जीवन स्तर में सुधार महसूस किया जा सकता है।

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किसान आंदोलन : सरकार के लिए अमृत कलश

आज के हुड़दंग भरे किसान आंदोलन और सरकार की निरपेक्ष रवैये को देख हमारे कुछ मित्र उद्वेलित हो खूनी क्रांति तक की बात कर रहे हैं। कुछ हताश हैं और हिंसात्मक विरोध की वकाकत कर रहे हैं, कुछ हैं जो अनाज के बाजार मूल्य में अप्रत्याशित इजाफा करने की बात कर रहे हैं। इन सब से इतर किसान के नाम पर भारतीय नौसेना तक का हिंसक विरोध शुरू हो गया है। जैम जार बवाल काटा जा रहा है। मुद्दा वही हैं, लोग वही है और किसान भी उसी स्थिती में हैं बस पॉकेटमार नेताओं की मांसाहारी भूख बढ़ती जा रही है। सरकार भी हर स्थिती में निकले अमृत कलश को झपटने को तैयार है।

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किसान आंदोलन को लपक लेने की हवस

 किसान आंदोलन को एकदम से लपक लेने की हवस नई और पुरानी राजनीतिक पार्टियों को मुद्दे से अलग कर रही है। सत्ता में बैठे राजनीतिज्ञों का पूरा जोर है कि जैसे तैसे लेमनचूस थमा मामले को ठंडा कर योजना तैयार करने के नाम पर एक दीर्घकालिक चक्र में उलझाया जाये। वहीं तथाकथित बुद्धिजीवियों, NGO मार्का परजीवियों एवं सत्ता के बाहर की पार्टियों का पूरा जोर है कि मामला सुलझे नहीं। बीच मे किसान इन सब से दूर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।