शोषण के खिलाफ #MeToo की जंग: एक विश्लेषण

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प्रसिद्ध अभिनेता नाना पाटेकर पर अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा लगाये गए यौन शोषण के आरोपों के बाद सोशल मीडिया पर #MeToo आन्दोलन जंगल में आग की तरह फैल गया है. लगातार फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया, राजनीति समेत हर क्षेत्र से महिलाएं अपनी-अपनी आपबीती दुनिया को सुनाने के लिए सामने आ रही है. मनोरंजन जगत में साजिद खान, चेतन भगत, उत्सव चक्रबर्ती और अदिति मित्तल से ले कर एम.जे. अकबर, मेघनाद बोस, विनोद दुआ सरीखे पत्रकार और केन्द्रीय मंत्री भी इन आरोपों की चपेट में आ रहे है. लेकिन MeToo आन्दोलन महीने भर पहले केवल भारत में शुरू हुआ एक हैशटैग मात्र नहीं है. MeToo आन्दोलन आज से 12 साल पहले अफ्रीकी-अमरीकी समाज सुधारक टराना बर्क द्वारा सोशल मीडिया साईट myspace पर शुरू किया गया था. बर्क का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को अपने साथ हुए अभद्र व्यव्हार को व्यक्त करने के लिए और उसके खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था.

करीब 11 साल बाद 2017 में अमरीकी अभिनेत्री अलिसा मिलानो ने कद्दावर फिल्म निर्माता हार्वे वाइन्स्ताइन पर यौन शोषण के आरोप लगाते हुए ट्विटर पर एक बार फिर #MeToo आन्दोलन की शुरुआत की. बाद में उन्होंने इसका श्रेय टराना बर्क को भी दिया. इस एक ट्वीट के बाद हार्वे के खिलाफ इंडस्ट्री की करीब 80 महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाये. परिणाम स्वरुप हार्वे को तुरंत उन्ही की कंपनी दी वाइन्स्ताइन कंपनी और अकादेमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंस से निकाल दिया गया. आंकड़ो पर गौर किया जाए तो केवल दो दिन में ही #MeToo को करीब 5 लाख बार ट्वीट किया गया और फेसबुक पर पहले ही दिन 40 लाख बार #MeToo का उल्लेख किया गया. मिलानो के इस एक ट्वीट के बाद पूरे हॉलीवुड में पुरुष कलाकारों समेत सभी अभिनताओं ने अपने साथ घटी घटनाओं का उल्लेख करना शुरू किया. हॉलीवुड से साहस ले कर दुसरे क्षेत्रों से भी अन्याय के खिलाफ #MeToo के संघोष की आवाज़े आने लगी और जल्द ही इस आन्दोलन ने प्रबुद्ध वर्ग के साथ-साथ आमजन को भी अपने साथ जोड़ लिया. इसके अलावा नारीवादी लेखिका ग्लोरिया फेल्ट ने दावा किया कि इस आन्दोलन के प्रभाव से अधिकतर कंपनियों ने अपने कार्यस्थल की एंटी-सेक्सुअल हैरासमेंट नीतियों को और प्रभावी और लिंग आधारित वेतन भेद का निरिक्षण करने जैसे अहम फैसलें लिए है.

MeToo का शक्ति प्रदर्शन तो तब देखने को मिला जब संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस ने मेम्बर एंड एम्प्लोयी ट्रेनिंग एंड ओवरसाइट ऑन कांग्रेस बिल (Me Too कांग्रेस एक्ट) पारित किया. इस बिल के अनुसार सरकार द्वारा शोषण के मामलों को संबोधित करने के तरीकों में संशोधन किए गए. संशोधन से पहले कार्यस्थल की आतंरिक एंटी-हैरासमेंट कमेटी शोषण की शिकयातों का निपटारा गुप-चुप तरीके से किया करती थी और मामले के समझौते का भुगतान संघीय कर के रूप में किया जाता था. MeToo बिल के पारित होने के बाद एंटी-हैरासमेंट कमेटी से मामलों को गोपनीय रखने के अधिकार छीन लिए गए. साथ ही इस बिल ने शोषण-पीड़ितों को कार्यस्थल बदलने की छूट भी प्रदान की और इतिहास में पहली बार इस बिल में अवैतानिक कर्मचारियों व अन्य को भी शामिल किया गया.

भारत में इस आन्दोलन का “प्रवेश” मुख्यतः अक्टूबर 2017 में हुआ जब सामाजिक कार्यकर्ता इंजी पन्नू द्वारा 60 प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक “लिस्ट” सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई. इंजी ने आरोप लगाया कि इस सूची में मौजूद सभी लोगों ने व्यक्तिगत रूप से अपने द्वारा किए गए शोषण की घटनाओं की पुष्टि की है. इंजी और उनकी सहायक राया सरकार द्वारा उठाये गए इस कदम के बाद Me Too आन्दोलन की कड़ी आलोचना शुरू हो गई. कहा गया कि इन आरोपों की पुष्टि किए बिना सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने से तथाकथित आरोपियों की छवि ख़राब की गई है. जवाब में राया सरकार ने कहा कि उन्होंने ये लिस्ट दुसरो को इन तथाकथित शोषकों से सावधान करने के लिए साझा की है. लेकिन भारतीय नारीवादियों ने खुद इस “लिस्ट” को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह का प्रयास आवश्यक है लेकिन बिना पुष्टि किए इतने सम्मानित लोगों के नाम सार्वजनिक करना एक गैर-जिम्मेदाराना कदम है. इसके बाद भारत में MeToo आन्दोलन का दूसरा चरण 27 सितम्बर 2018 को अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने शुरू किया. दत्ता ने वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर पर आरोप लगाते हुए बताया कि 2008 में नाना पाटेकर ने एक गाने की शूटिंग के दौरान उनका शारीरिक शोषण करने की कोशिश की. तनुश्री दत्ता के इस आरोप के बाद भारत में मनोरंजन, मीडिया, राजनीति समेत सभी क्षेत्रों से महिलाएं सामने आ कर अपने साथ हुई अभद्रता की घटनाएं साझा कर रही है जो कि अब विशाल रूप धारण कर चुका है.

हालाँकि इस आन्दोलन को कुछ आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ रहा है. बुद्धजीवियों द्वारा इस आन्दोलन के तहत लगने वाले आरोपों की सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाए जा रहे है. कई मामलों में ऐसी आशंका है कि व्यक्तिगत मतभेदों के कारण बदले की भावना से ऐसे आरोप लग रहे है. इस आन्दोलन का दुरूपयोग करते हुए समाज में प्रतिष्ठित व्यक्तियों की छवि धूमिल की जा रही है. इसी कड़ी में मीडिया की भूमिका भी संदेह के घेरे में है. रोज़ अनेकों पोस्ट #MeToo के नाम से सोशल मिडिया पर आ रहे हैं और कुछ लोग बिना सोचे समझे इस “सोशल मीडिया ट्रेंड” के माध्यम से आकर्षण प्राप्त करना चाहते है. आने वाले समय में मुख्यतः भारत में यह विषय और जोर पकड़ने वाला है, ऐसे में सही और गलत का विभाजन करना और वास्तविक पीड़ितों को समय रहते न्याय देना हम सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए.

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